રવિવાર, 29 જુલાઈ, 2012

Gazal

समन्दरों में मुआफिक* हवा चलाता है
जहाज़ खुद नहीं चलते खुदा चलाता है ।
[*favourable]

ये जा के मील के पत्थर पे कोई लिख आये
वो हम नहीं हैं, जिन्हें रास्ता चलाता है ।

वो पाँच वक़्त नज़र आता है नमाजों में
मगर सुना है कि शब को जुआ चलाता है ।

ये लोग पांव नहीं जेहन से अपाहिज हैं
उधर चलेंगे जिधर रहनुमा चलाता है ।

हम अपने बूढे चिरागों पे खूब इतराए
और उसको भूल गए जो हवा चलाता है ।

- राहत इन्दौरी

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